कई दशकों तक ग्रामीण स्वच्छता देशभर में विकास से जुड़ी एक बड़ी चुनौती रही। वर्ष 2014 में स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) शुरू होने के समय ग्रामीण स्वच्छता कवरेज 39% था। वर्ष 2019 तक ग्रामीण भारत ने 100% स्वच्छता कवरेज हासिल कर लिया। 2014 से 2019 के बीच 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10.28 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए। इसके बाद 2019 में ग्रामीण भारत को ‘खुले में शौच से मुक्त’ (ओडीएफ) घोषित किया गया। इस उपलब्धि ने देश के स्वच्छता परिदृश्य को व्यापक रूप से बदला। अब ध्यान केवल घरों में शौचालय उपलब्ध कराने से आगे बढ़कर स्वच्छता की आदतों को लंबे समय तक बनाए रखने और गांवों में ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन जैसी व्यापक व्यवस्थाओं पर केंद्रित है। स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (एसबीएम-जी) के दूसरे चरण में इसी पर विशेष जोर दिया गया है।
ओडीएफ प्लस गांवों पर बढ़ा जोर
एसबीएम-जी के दूसरे चरण का उद्देश्य ओडीएफ का दर्जा बनाए रखने के साथ ठोस और तरल कचरे के प्रभावी प्रबंधन की व्यवस्था विकसित करना है। ओडीएफ प्लस गांव न केवल खुले में शौच से मुक्त स्थिति बनाए रखते हैं, बल्कि ठोस और तरल कचरे का प्रबंधन तथा स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करने पर भी ध्यान देते हैं। ओडीएफ प्लस गांवों को तीन श्रेणियों—एस्पायरिंग, राइजिंग और मॉडल—में बांटा गया है। एस्पायरिंग गांव ठोस या तरल कचरे में से किसी एक का प्रबंधन करते हैं। राइजिंग गांव दोनों प्रकार के कचरे का प्रबंधन करते हैं, जबकि मॉडल गांव दोनों तरह के कचरे के प्रबंधन के साथ साफ-सफाई बनाए रखते हैं और ओडीएफ प्लस से जुड़े संदेश भी प्रदर्शित करते हैं।
5.69 लाख गांव ओडीएफ प्लस
17 सितंबर 2026 तक देश में 5.69 लाख ओडीएफ प्लस गांव बन चुके हैं। इनमें से 5.25 लाख गांवों ने ओडीएफ प्लस मॉडल का दर्जा हासिल किया है। इसके अलावा 5.38 लाख गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन की व्यवस्था और 5.65 लाख गांवों में तरल कचरा प्रबंधन प्रणालियां स्थापित की गई हैं। वर्तमान में 582 जिलों में 1,314 गोबरधन (GOBARdhan) बायोगैस प्लांट काम कर रहे हैं। घरों के स्तर पर 12.22 करोड़ व्यक्तिगत शौचालय और 98,273 बायोगैस प्लांट बनाए गए हैं।
गोबरधन से कचरे का उपयोग
गोबरधन यानी ‘गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन’ स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के दूसरे चरण की प्रमुख पहलों में शामिल है। इसके तहत मवेशियों के गोबर, कृषि अवशेषों और जैविक कचरे को बायोगैस, कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) और जैविक खाद या बायो-स्लरी में बदला जाता है। इससे कचरे के प्रबंधन के साथ स्थानीय स्तर पर संसाधनों के पुन: उपयोग को बढ़ावा मिलता है।
शौचालय बनाने से आदतें विकसित करने तक
राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े बताते हैं कि स्थायी स्वच्छता व्यवस्था केवल बुनियादी ढांचे से नहीं बनती, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में बदलाव भी जरूरी है। शौचालय तभी प्रभावी होता है जब परिवार उसका नियमित इस्तेमाल करें, उसकी देखभाल करें और उसे उपयोग योग्य बनाए रखें। इसी तरह कचरे का सही प्रबंधन भी परिवारों की रोजमर्रा की आदतों से शुरू होता है। इसी दृष्टिकोण के तहत एसबीएम-जी ने ओडीएफ परिणामों को बनाए रखने के लिए ‘बिहेवियर चेंज कम्युनिकेशन’ यानी व्यवहार परिवर्तन संचार (बीसीसी) को महत्वपूर्ण आधार बनाया है। परिवारों को शौचालय के सुरक्षित इस्तेमाल, कचरे के उचित निपटान, स्वच्छता की सही तकनीकों और गीले कचरे के कंपोस्ट पिट या बायोगैस प्लांट के जरिए प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हाथ धोना, पानी को सुरक्षित रखना, स्वच्छता सुविधाओं का रखरखाव करना और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा न फेंकना या थूकना जैसी रोजमर्रा की आदतों पर भी जोर दिया जाता है। इस तरह स्वच्छता केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं रहती, बल्कि परिवारों और समुदायों की दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनती है।
महिलाएं बनीं बदलाव की एजेंट
महिलाएं ग्रामीण स्वच्छता में आए बदलाव के केंद्र में रही हैं। स्वच्छता का सीधा संबंध महिलाओं की गोपनीयता, सुरक्षा, गरिमा और स्वास्थ्य से है। वे केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास में सक्रिय भागीदार और सामाजिक बदलाव की एजेंट भी हैं। एसबीएम-जी के दिशानिर्देश स्वच्छाग्रही के रूप में महिलाओं की भागीदारी को प्राथमिकता देते हैं। दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) के स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को भी व्यवहार परिवर्तन संचार के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा गया है। स्वच्छाग्रही घर-घर संपर्क, जागरूकता गतिविधियों और स्वच्छता सत्यापन के जरिए परिवारों को शौचालय के इस्तेमाल और उसके रखरखाव के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
एसएचजी ने संभाली कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी
महिला समूहों ने स्वच्छता जागरूकता को समुदाय के नियमित कार्यों से जोड़ने में भी भूमिका निभाई है। पश्चिम बंगाल के हावड़ा में एसएचजी समूहों ने गंगा किनारे बसे 18 ग्राम पंचायतों में प्लास्टिक हटाने के अभियान में सहयोग किया और 18 दिनों में 9.32 टन प्लास्टिक कचरा एकत्र किया। इस पहल से एसएचजी फेडरेशन के माध्यम से प्लास्टिक संग्रह का नियमित नेटवर्क भी तैयार हुआ। इसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों, पंचायत अधिकारियों, समुदाय के लोगों और बाजार के विक्रेताओं को साथ लाया गया। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में लगभग एक दर्जन एसएचजी महिलाएं रिसोर्स रिकवरी सेंटर चलाती हैं। वे घरों से कचरा एकत्र कर उसे गीले और सूखे कचरे में अलग करती हैं। गीले कचरे को वर्मीकम्पोस्ट में बदला जाता है, जबकि सूखे कचरे को बिक्री के लिए भेजा जाता है। इससे महिलाओं को मजदूरी के साथ अतिरिक्त आय भी होती है। मध्य प्रदेश के भोपाल में एक क्लस्टर लेवल फेडरेशन मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी संचालित करता है। स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के साथ हुए समझौता ज्ञापन के तहत यहां एकत्र प्लास्टिक कचरे की खरीद-बिक्री की जाती है। इससे स्पष्ट है कि स्वच्छता में महिलाओं की भागीदारी जागरूकता से आगे बढ़कर कचरा प्रबंधन, रोजगार और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने तक पहुंच रही है।
स्कूल से घर तक स्वच्छता का संदेश
महिला संगठनों के साथ स्कूल भी स्वच्छता संबंधी व्यवहार को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। स्कूल बच्चों को स्वच्छता, सफाई और कचरा प्रबंधन की आदतें विकसित करने के साथ उन्हें परिवार और समुदाय तक पहुंचाने का अवसर देते हैं। एसबीएम-जी के दूसरे चरण में स्कूलों को स्वच्छता परिणामों को बनाए रखने वाले महत्वपूर्ण संस्थानों के रूप में मान्यता दी गई है। इसमें कार्यात्मक स्वच्छता सुविधाओं और जैव अपघटनीय तथा तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था पर जोर दिया गया है। झारखंड के चंदिल में एक स्कूल ने एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया और रसोई तथा स्नानघरों से निकलने वाले ग्रेवाटर के प्रबंधन के लिए सोख गड्ढा बनाया। शिक्षक नियमित रूप से छात्रों को व्यक्तिगत स्वच्छता और किशोरावस्था से जुड़े विषयों के बारे में भी जागरूक करते हैं। इससे स्वच्छता का संदेश स्कूल से घर और फिर समुदाय तक पहुंचता है।
युवाओं को बनाया जा रहा स्वच्छता अभियान का भागीदार
‘स्वच्छता ही सेवा 2026’ में छात्रों और युवाओं को व्यवहार परिवर्तन के केंद्र में रखा जा रहा है। स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को स्वच्छता को जीवनशैली का हिस्सा बनाने वाले स्थानों के रूप में विकसित करने पर जोर है। गतिविधियों में स्वच्छता ज्ञान यात्राएं, स्कूल संवाद और स्रोत पर कचरे के पृथक्करण के प्रदर्शन शामिल हैं। छात्र ‘स्वच्छता एवं जल संवाद’ में भी हिस्सा लेंगे और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 2026 के बारे में जानकारी हासिल करेंगे। इससे स्कूल-से-घर की प्रक्रिया को स्कूल-से-समुदाय के व्यापक अभियान में बदलने का प्रयास किया जा रहा है।
बच्चों की भागीदारी स्वच्छता से आगे
बच्चों की भूमिका पारंपरिक स्वच्छता गतिविधियों से आगे बढ़ रही है। झारखंड में चाइल्ड कैबिनेट के सदस्यों ने मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) गतिविधियों की जिम्मेदारी संभाली है। एक स्कूल में छात्राएं सैनिटरी पैड का स्टॉक रजिस्टर संभालती हैं, जबकि चाइल्ड कैबिनेट के सदस्य उनकी नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहयोग करते हैं। झिकपानी के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में चाइल्ड कैबिनेट के मंत्रियों ने स्कूल प्रशासन के सामने एमएचएम प्रयोगशाला बनाने का प्रस्ताव रखा। बाद में स्कूल फंड और बाहरी संसाधनों की मदद से यह प्रयोगशाला तैयार की गई।
ग्राम पंचायतों की भूमिका अहम
घर और स्कूल में स्वच्छता की आदतों को समुदाय स्तर पर बनाए रखने के लिए संस्थागत व्यवस्थाओं की जरूरत होती है। घरों से निकलने वाले कचरे का संग्रह, पृथक्करण और निपटान, ग्रेवाटर की निकासी तथा सार्वजनिक स्थानों की नियमित सफाई जैसी व्यवस्थाओं में ग्राम पंचायतों की भूमिका अहम हो जाती है। एसबीएम-जी के तहत ग्राम पंचायतें गांव स्तर पर स्वच्छता से जुड़ी गतिविधियों की योजना बनाने और उन्हें लागू करने के लिए जिम्मेदार हैं। इसमें बुनियादी ढांचे के साथ समुदाय को संगठित करना, मांग पैदा करना, स्वच्छता को बढ़ावा देना, सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) तथा क्षमता निर्माण जैसी गतिविधियां भी शामिल हैं।
सामुदायिक संस्थाओं से मजबूत हुआ ढांचा
गांव की जल और स्वच्छता समितियां (वीडब्ल्यूएससी) योजना बनाने, समुदाय को जोड़ने, कार्यों के क्रियान्वयन, निगरानी और व्यवहार परिवर्तन में सहयोग देकर इस संस्थागत ढांचे को मजबूत करती हैं। हरियाणा की गाडली ग्राम पंचायत इसका उदाहरण है, जिसने समुदाय आधारित प्रक्रिया के जरिए ओडीएफ प्लस मॉडल का दर्जा हासिल किया। सरपंच कांता कंवर ने सफाई समिति के साथ मिलकर सामुदायिक और व्यक्तिगत शौचालय, पूरे गांव में जल निकासी व्यवस्था और पांच तालाबों के जरिए ग्रेवाटर के उपचार की व्यवस्था की। गांव ने गोबरधन बायोगैस प्लांट भी अपनाए, जिनमें गोबर को खाद और बायोगैस में बदला गया और बायो-स्लरी का इस्तेमाल खेती में किया गया। जन रैलियों, बैठकों और घोषणाओं के जरिए भी इन गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया। यह उदाहरण दिखाता है कि व्यक्तिगत स्वच्छता की आदतें जब स्थानीय संस्थाओं और सामूहिक प्रयासों से जुड़ती हैं तो पूरे गांव की स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत कर सकती हैं।
लोगों की पहल, संस्थाओं का सहयोग
जन-नेतृत्व वाले स्वच्छता अभियान को सरकारी संस्थाओं की फंडिंग, समन्वय और क्षमता निर्माण से समर्थन मिलता है। एसबीएम-जी सरकारी आवंटन, वित्त आयोग के अनुदान, ‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ फंड तथा आय जुटाने के अन्य माध्यमों से संसाधन उपलब्ध कराता है। डीएवाई-एनआरएलएम के साथ तालमेल से एसएचजी और सीएलएफ जुड़ते हैं, जबकि कौशल विकास की पहल जमीनी स्तर की क्षमताओं को मजबूत करती है और जल जीवन मिशन ग्रेवाटर प्रबंधन में सहयोग करता है। इस बहुस्तरीय संस्थागत ढांचे में ग्राम पंचायतें क्रियान्वयन, ब्लॉक स्तर की इकाइयां मार्गदर्शन, जिले तकनीकी सहायता और राज्य तथा केंद्र स्तर की संस्थाएं फंडिंग और समन्वय की भूमिका निभाती हैं।
स्वच्छता बनी सामुदायिक गतिविधि
‘जन भागीदारी’ ने स्वच्छता को समुदाय की साझा जिम्मेदारी के रूप में मजबूत किया है। सफाई अभियान पंचायत प्रतिनिधियों, स्वयं सहायता समूहों, युवाओं, स्कूलों और स्थानीय समुदायों को साथ लाकर सामूहिक जिम्मेदारी को नियमित गतिविधि में बदलते हैं। कर्नाटक का ‘स्वच्छ शनिवार’ इसका उदाहरण है। अभियान से पहले पंचायत प्रतिनिधि गांव के समुदायों, युवा समूहों, सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों के साथ संवाद करते हैं। हर महीने के पहले शनिवार को समुदाय स्कूलों, आंगनवाड़ियों, अस्पतालों, कार्यालयों, जल स्रोतों, मंदिरों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सफाई करता है। इसमें श्रमदान, कचरे का पृथक्करण, नालियों की सफाई, खाद के गड्ढों के लिए स्थान की पहचान और दीवार लेखन के जरिए स्वच्छता संदेश देना शामिल है।
‘स्वच्छता ही सेवा’ से जनभागीदारी को बढ़ावा
2017 में शुरू किया गया ‘स्वच्छता ही सेवा’ (एसएचएस) अभियान स्वच्छता में नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा देने वाला वार्षिक अभियान है। यह सरकारी संस्थानों, स्थानीय निकायों, संगठनों और नागरिकों को स्वच्छता की साझा जिम्मेदारी के लिए एक मंच पर लाता है। ‘स्वच्छता ही सेवा 2025’ में 18.06 करोड़ से अधिक नागरिकों ने भाग लिया। ‘स्वच्छता ही सेवा 2026’ की शुरुआत 17 सितंबर से होगी। इसका विषय ‘स्वच्छता में सहभाग; स्वच्छ भारत, विकसित भारत’ है। 1 अक्टूबर को नागरिक ‘एक दिन, एक घंटा, एक साथ’ के तहत सामूहिक श्रमदान करेंगे। 2 अक्टूबर को गांवों में विशेष ग्राम सभाएं और स्वच्छता जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अभियान के जरिए स्वच्छ सार्वजनिक स्थानों और निरंतर स्वच्छता बनाए रखने के लिए सामुदायिक प्रयासों को बढ़ावा दिया जाएगा।
स्वच्छता से रोजगार के नए अवसर
स्वच्छता व्यवस्था विकसित होने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं। मध्य प्रदेश के बैतूल में बबीता धुर्वे को घर-घर कचरा संग्रह का काम मिला। वर्ष 2021 में माता-पिता दोनों को खोने के बाद उन्होंने कचरा संग्रह के लिए ई-रिक्शा चलाने के उद्देश्य से ग्राम पंचायत से संपर्क किया। शुरुआत में विरोध का सामना करने के बावजूद उन्होंने ई-रिक्शा चलाना सीखा और जिले की पहली महिला ई-रिक्शा कचरा संग्रहकर्ता बनीं। बैतूल में अब करीब 100 ग्राम पंचायतें कचरा संग्रह वाहनों का इस्तेमाल कर रही हैं। यह उदाहरण बताता है कि स्वच्छता व्यवस्था गांवों की सफाई सुधारने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकती है।
स्वच्छता ने बनाया स्थानीय कौशल का इकोसिस्टम
स्वच्छता से जुड़े रोजगार की संभावनाएं केवल कचरा प्रबंधन तक सीमित नहीं हैं। पश्चिम बंगाल के नदिया में शौचालय निर्माण बढ़ने के साथ प्रशिक्षित राजमिस्त्रियों की मांग बढ़ी। इसके बाद राजमिस्त्री प्रशिक्षण के लिए दो संस्थान खोले गए और करीब 2,400 पुरुषों और महिलाओं को शौचालय निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। इससे संकेत मिलता है कि स्वच्छता क्षेत्र निर्माण, कचरा संग्रह, परिवहन, प्रसंस्करण और रखरखाव जैसे विभिन्न कार्यों को जोड़कर स्थानीय रोजगार का व्यापक इकोसिस्टम विकसित कर सकता है।
कचरे को संसाधन में बदलने पर जोर
जैसे-जैसे स्वच्छता प्रणालियों का विस्तार हो रहा है, समुदाय आधारित पहलों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे और तकनीकी सहयोग की जरूरत भी बढ़ रही है। गुजरात का वेदांचा गांव इसका उदाहरण है, जहां समुदाय की मांग के आधार पर स्थानीय स्तर पर ग्रेवाटर प्रबंधन प्रणाली तैयार की गई। इस प्रणाली को स्थानीय जमीन और पानी के बहाव के पैटर्न को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया। इसके संचालन और रखरखाव में स्थानीय ठेकेदारों की मदद ली गई और पंचायत सदस्यों, ऑपरेटरों तथा संबंधित नागरिकों को प्रणाली के प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रणाली रोजाना 200 किलोलीटर ग्रेवाटर का उपचार करती है। उपचारित पानी का इस्तेमाल सिंचाई और भूजल रिचार्ज के लिए किया जाता है। पंचायत खाद और उपचारित पानी के पुन: उपयोग से सालाना करीब 2.5 लाख रुपए की आय अर्जित करती है। इस पहल से पानी और मच्छर जनित बीमारियों में कमी आने की भी जानकारी सामने आई है।
स्वच्छता यात्रा अब निरंतरता की ओर
ग्रामीण स्वच्छता का मुख्य उद्देश्य अब केवल शौचालय निर्माण या बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता नहीं, बल्कि व्यवहार में निरंतरता और सामूहिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करना है। ओडीएफ प्लस गांवों को खुले में शौच से मुक्त स्थिति बनाए रखने के साथ ठोस और तरल कचरे का प्रबंधन तथा स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करना होता है। इस तरह भारत की स्वच्छता यात्रा बुनियादी सुविधाओं की पहुंच से उनके इस्तेमाल और फिर निरंतर रखरखाव तक पहुंची है। स्वच्छ भारत की सफलता का आकलन केवल बनाए गए बुनियादी ढांचे से नहीं, बल्कि इस बात से भी होता है कि स्वच्छता लोगों और समुदायों की रोजमर्रा की आदत बन पाती है या नहीं। स्वच्छ गांव केवल समुदायों के लिए तैयार नहीं किए जाते, बल्कि उन्हें समुदाय मिलकर बनाते और बनाए रखते हैं।