विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास-2026 की चातुर्मासिक प्रवचनमाला में गुरुवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने आश्रम को मन पर नियंत्रण रखने का संदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि मन मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यदि मन की शक्ति बढ़ने लगे तो उसे संयम और धर्म के माध्यम से परास्त करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार व्यक्ति अपनी धन-संपत्ति की रक्षा के लिए सदैव निवास करता है, उसी प्रकार आत्मरूपी तत्व की भी सतत निगरानी करनी चाहिए। जिनके मन में अलग-अलग प्रकार के आचरण और विचार रहते हैं, उन्हें समझाना कठिन होता है। जो शुभ संस्कारों के साथ जीवन जीते हैं, उनके अंदर शुभ ध्यान, शुभ ज्ञान और धर्म-ध्यान का भाव निरंतर बना रहता है। धर्म-ध्यान ही मनुष्य को शुभ ज्ञान और आत्म कल्याण की दिशा में विनाश करता है।
उन्होंने कहा कि आपका अंतिम लक्ष्य मोक्ष है। धर्म सभा में जिनवाणी का श्रवण करके मनुष्य मोक्ष मार्ग के करीब आता है, लेकिन सभा से बाहर रहकर यदि मन पुनः मोक्ष मोह-माया और संकट में उलझ जाता है, तो वह अपने लक्ष्य से भटक जाता है। मन की प्रशंसा की भूख कभी नहीं भरती और यही मन साधक को मोक्ष मार्ग से विमुख कर देती है।
वर्षों से जिनवाणी का श्रवण करने के बावजूद यदि जीवन में उसका आचरण नहीं हो रहा है, तो मोक्ष का मार्ग दूर ही रहेगा। शास्त्रकार भगवंतों ने यह भी कहा है कि "नज़रें पाना आसान है, लेकिन नज़रें पाना कठिन है।" इसलिए साधक को अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
वर्षावास का पावन अवसर मन को निर्मल बनाने का सर्वोत्तम योग है। मन को जो अच्छा लगे, वह करने के बजाय जो आत्महितकारी और हितैषी हो, वही करना चाहिए। धर्म-ध्यान के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए प्रभु के वचन मनुष्य को शुभ भावना, ध्यान और अनुप्रेक्षा की ओर ले जाते हैं।
सच्चा सुख ही एकमात्र धर्म है: मुनि शाश्वतरत्न सागर
ने धर्मसभा में कहा कि मनुष्य ने पूरे जीवन में यह उपदेश दिया है कि उसे कभी-कभी सुख की प्राप्ति होती है, लेकिन परमात्मा ने स्पष्ट कहा है कि यह संसार मूलतः दुःखमय है। इसलिए सत्य सुख की प्राप्ति के मार्ग पर चलना ही वास्तविक सुख की प्राप्ति का माध्यम है।
उन्होंने कहा कि उनके दृष्टिकोण के आधार पर चार गोलियों में कहा जा सकता है। सबसे पहले वह, जिसने अपने द्वारा माने गए सुख को ही वास्तविक सुख बताया है। दूसरा वह, जो परमात्मा के पद पर आसीन सुख को स्वीकार करता है, लेकिन व्यवहार में अपने अस्तित्व में सुख को अधिक महत्व देता है। तीसरे प्रकार का व्यक्ति परमात्मा द्वारा चिन्हित सुख के मार्ग को ही त्याग देता है, जबकि चौथे प्रकार के परमात्मा के द्वारा घोषित सुख को सही दर्जा नहीं दिया जाता है, लेकिन उसे अपने जीवन में मान्यता का तो पुरुषार्थ करता है और वह अपना लक्ष्य निर्धारित करता है। यदि वास्तविक सुख प्राप्त करना है तो परमात्मा के संप्रदाय में प्रवेश करना ही आवश्यक नहीं है, बल्कि उसे आचरण में उतारना भी आवश्यक है।
गुरुभगवंत को बोहराया सूत्र,पांच ज्ञान की होगी पूजा
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लूणिया व विश्वनाथ बरेड़िया ने बताया कि प्रतिदिन सुबह 8:45 बजे ज्ञानवल्लभ उपाश्रय, विवेकानंद नगर में नियमित प्रवचन जारी है। 31 जुलाई को गुरु भगवंत को सूत्र बोहराया जाएगा। जिसका वाचन चातुर्मास के दौरान होगा। सूत्र बोहरने का लाभ सरलादेवी अमरचंद झाबक परिवार से मिलता है। ऐसे ही पांच ज्ञान की पूजा होगी। प्रथम ज्ञान पूजा का लाभभम्भीर बाई परिवार, द्वितीय ज्ञान पूजा का लाभ कमलाबाई पारख परिवार, तृतीय ज्ञान पूजा का लाभ महिन्द्रा पवन बर्ड परिवार, चतुर्थ ज्ञान पूजा का लाभभम्भर पवन बर्ड परिवार एवं द्वितीय ज्ञान पूजा का लाभ कमलाबाई पारसचन्द्र परिवार को प्राप्त हुआ है।