इजराइल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लंबे समय से चली आ रही सत्ता के सामने अब नई चुनौती खड़ी हो गई है। राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग ने विपक्षी नेता और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट को देश में नई सरकार बनाने का अवसर देने का फैसला किया है। 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। इसके बाद राष्ट्रपति ने विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श किया और अंततः आइजेनकोट के पक्ष में फैसला लिया। इस निर्णय को नेतन्याहू के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। हालांकि, राष्ट्रपति की ओर से सरकार बनाने का न्योता मिलना सत्ता परिवर्तन की अंतिम प्रक्रिया नहीं है। आइजेनकोट को अब संसद में बहुमत साबित करने के लिए विभिन्न दलों को साथ लाना होगा
इजराइल के राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, संसदीय दलों के साथ हुई बातचीत में 67 सांसदों ने गादी आइजेनकोट को सरकार बनाने का मौका देने की सिफारिश की, जबकि 46 सांसदों ने बेंजामिन नेतन्याहू के समर्थन में अपनी राय रखी। सात सांसदों वाली अति-रूढ़िवादी यूनाइटेड टोरा जूडिज्म पार्टी ने किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया। इसी राजनीतिक गणित ने आइजेनकोट के लिए सरकार बनाने का रास्ता खोला। राष्ट्रपति हर्जोग ने 7 नवंबर को अपने फैसले की जानकारी दी और 8 नवंबर को शाम पांच बजे उन्हें औपचारिक रूप से सरकार बनाने का जनादेश सौंपने की घोषणा की
27 अक्टूबर को हुए चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी एकल पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि आइजेनकोट की याशर पार्टी को 21 सीटें मिलीं। हालांकि, सरकार बनाने के लिए इजराइल की 120 सदस्यीय संसद यानी नेसेट में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। चुनाव के बाद नेतन्याहू के दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को कुल 53 सीटें मिलीं, जबकि आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें हासिल हुईं। इसके अलावा दो अरब राजनीतिक दलों को मिलाकर 19 सीटें मिलीं। इन दलों ने नेतन्याहू के विरोध में आइजेनकोट को समर्थन देने की सिफारिश की। इस तरह उनके पक्ष में कुल 67 सांसदों का समर्थन सामने आया