दिवाली से पहले राजधानी दिल्ली में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन की ओर से कई तरह के प्रतिबंध और नियम लागू किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद बाजारों में अवैध पटाखों की बिक्री का मामला सामने आ रहा है। हैरानी की बात यह है कि कई जगहों पर प्रतिबंधित पटाखों को ग्रीन पटाखों के नाम पर बेचे जाने की शिकायतें मिल रही हैं। दुकानदार ग्राहकों को इन पटाखों के पर्यावरण के अनुकूल होने का दावा करते हुए बेच रहे हैं, जबकि उनकी वास्तविक गुणवत्ता और प्रमाणिकता पर सवाल उठ रहे हैं। दिल्ली में पहले से ही वायु प्रदूषण का स्तर काफी खराब बना हुआ है। कई इलाकों में एयर क्वालिटी इंडेक्स गंभीर श्रेणी के करीब पहुंच चुका है। ऐसे में दिवाली के दौरान पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल से प्रदूषण की स्थिति और बिगड़ने की आशंका है। सरकार और प्रशासन की ओर से लोगों को प्रदूषण कम करने के लिए जागरूक किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बाजारों में नियमों की अनदेखी किए जाने की खबरें सामने आ रही हैं।
ग्रीन पटाखों को सामान्य पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाने वाले विकल्प के रूप में पेश किया जाता है। इनका निर्माण निर्धारित मानकों और वैज्ञानिक तकनीक के आधार पर किया जाता है, ताकि पारंपरिक पटाखों की तुलना में उनसे निकलने वाले हानिकारक उत्सर्जन और कणों की मात्रा कम हो। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण मुक्त होते हैं। इनके इस्तेमाल से भी धुआं, आवाज और प्रदूषक तत्व निकल सकते हैं। इसलिए इनके उत्पादन और बिक्री के लिए निर्धारित नियमों का पालन करना जरूरी है। अधिकृत ग्रीन पटाखों की पहचान के लिए क्यूआर कोड और प्रमाणन जैसी व्यवस्थाएं भी निर्धारित की गई हैं। इसके बावजूद यदि सामान्य या प्रतिबंधित पटाखों को ग्रीन पटाखों के नाम पर बेचा जाता है, तो यह उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी के साथ-साथ पर्यावरण नियमों का उल्लंघन भी है।
दिल्ली में पटाखों की बिक्री को लेकर प्रदूषण नियंत्रण और सुरक्षा से संबंधित कई नियम लागू हैं। निर्धारित अवधि और अनुमति के बिना पटाखों की बिक्री, भंडारण तथा इस्तेमाल पर कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद यदि बाजारों में अवैध पटाखे पहुंच रहे हैं, तो यह निगरानी व्यवस्था के सामने चुनौती है। खासकर उन दुकानों पर सवाल उठते हैं, जहां बिना प्रमाणन वाले उत्पादों को ग्रीन पटाखे बताकर बेचा जा रहा है। ऐसे मामलों में संबंधित विभागों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे दुकानों की जांच करें, पटाखों के दस्तावेज और प्रमाणन की पड़ताल करें तथा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर उचित कार्रवाई करें। साथ ही ग्राहकों को भी खरीदारी के दौरान सतर्क रहने की जरूरत है। केवल दुकानदार के दावे पर भरोसा करने के बजाय पटाखों की पैकेजिंग, क्यूआर कोड और अधिकृत निर्माता से जुड़ी जानकारी की जांच करना जरूरी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पटाखों से निकलने वाला धुआं हवा में मौजूद प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकता है। इससे सांस लेने में परेशानी, खांसी, आंखों में जलन और गले में खराश जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अस्थमा और सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति अधिक परेशानी पैदा कर सकती है। बच्चों और बुजुर्गों पर भी प्रदूषित हवा का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा पटाखों से निकलने वाली तेज आवाज ध्वनि प्रदूषण बढ़ाती है और आसपास रहने वाले लोगों के साथ पशु-पक्षियों को भी प्रभावित कर सकती है। दिल्ली में पहले से मौजूद वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और पराली जलाने से आने वाला धुआं प्रदूषण की समस्या को गंभीर बना रहे हैं। ऐसे में पटाखों से निकलने वाला अतिरिक्त धुआं स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना सकता है।
दिवाली खुशियों और रोशनी का त्योहार है, लेकिन इसके उत्सव में पर्यावरण और लोगों की सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी है। प्रशासन के लिए चुनौती केवल प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि बाजारों में उनकी प्रभावी निगरानी और अवैध बिक्री पर रोक लगाना भी जरूरी है। वहीं, आम नागरिकों को भी ग्रीन पटाखों के नाम पर बेचे जा रहे संदिग्ध उत्पादों से सावधान रहना चाहिए। नियमों का पालन, जागरूकता और जिम्मेदार व्यवहार ही प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के बीच यह जरूरी है कि दिवाली का उत्सव ऐसा हो, जिसमें खुशियों के साथ स्वच्छ हवा और सुरक्षित वातावरण को भी प्राथमिकता मिले।