भारत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और चिप डिजाइन के क्षेत्र में खुद को वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, सरकार की रणनीति केवल कुछ सेमीकंडक्टर प्लांट लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, उपकरण, सामग्री, अनुसंधान एवं विकास और कुशल प्रतिभाओं को जोड़कर एक संपूर्ण सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करना है।
आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है सेमीकंडक्टर उद्योग
सेमीकंडक्टर आधुनिक अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत बन चुके हैं। कार, मोबाइल फोन, ड्रोन और विमान से लेकर एमआरआई मशीनों तक, बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और प्रणालियां चिप पर निर्भर हैं। वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का आकार करीब 4.3 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है और इसमें लगातार विस्तार हो रहा है। सेमीकंडक्टर चिप दुनिया में बनाए जाने वाले सबसे जटिल उत्पादों में शामिल हैं। वैष्णव ने तकनीकी प्रगति का उदाहरण देते हुए एप्पल के A19 Bionic चिप का उल्लेख किया, जो 3-नैनोमीटर प्रक्रिया पर आधारित है और इसमें करीब 30 अरब ट्रांजिस्टर हैं।
कोरोना महामारी ने बढ़ाया रणनीतिक महत्व
कोविड-19 महामारी ने वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर किया। चिप की कमी से दुनिया के कई उद्योग प्रभावित हुए। इसके बाद विभिन्न देशों ने घरेलू सेमीकंडक्टर क्षमताएं विकसित करने के प्रयास तेज कर दिए। कई विकसित देशों ने इस दिशा में दशकों पहले काम शुरू कर दिया था। भारत अब अपनी मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को आधार बनाकर इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।
भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा छह दशक पुरानी
भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करने की कोशिश नई नहीं है। वैष्णव के मुताबिक, 1960 में दुनिया की शुरुआती सेमीकंडक्टर कंपनियों में शामिल फेयरचाइल्ड सेमीकंडक्टर ने भारत में कारोबार स्थापित करने की संभावनाएं तलाश की थीं। हालांकि, उस समय की आर्थिक नीतियों और उत्पादन कोटा व्यवस्था के कारण कंपनी आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद भी कई दशकों में प्रयास हुए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। 2010 के दशक की शुरुआत में भी सेमीकंडक्टर उद्योग को बढ़ावा देने की कोशिश हुई। वैष्णव के अनुसार, उस समय रणनीति और उसके क्रियान्वयन के बीच पर्याप्त तालमेल नहीं था। उन्होंने ऐसे उदाहरणों का भी उल्लेख किया, जब सेमीकंडक्टर कंपनियों ने भारत में मैन्युफैक्चरिंग उपकरण भेजे, लेकिन कस्टम्स से उन्हें वापस भेज दिया गया।
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग ने तैयार की मजबूत नींव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने पहले भारत में व्यापक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग आधार तैयार करने पर जोर दिया। ‘मेक इन इंडिया’, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, टैक्स और कस्टम ड्यूटी से जुड़े सुधारों के साथ कई मैन्युफैक्चरिंग सपोर्ट स्कीम शुरू की गईं। इन प्रयासों से मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्माण को भारत में बढ़ावा मिला। धीरे-धीरे वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल फोन कंपनियों ने देश में अपनी मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां बढ़ाईं। वैष्णव के अनुसार, भारत में अब 300 से अधिक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का मूल्य 130 अरब डॉलर को पार कर चुका है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 48 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। मोबाइल फोन भारत का सबसे बड़ा निर्यातित उत्पाद बन गया है और उसने पेट्रोलियम उत्पादों तथा रत्न एवं आभूषणों को पीछे छोड़ दिया है। इस क्षेत्र से करीब 25 लाख रोजगार भी जुड़े हैं। यही बढ़ता हुआ मैन्युफैक्चरिंग आधार भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए शुरुआती नींव बना।
2021 में शुरू हुआ सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में मिली सफलता के आधार पर सरकार ने 2021 में सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम शुरू किया। इसका उद्देश्य केवल अलग-अलग प्लांट स्थापित करना नहीं, बल्कि एक मजबूत और व्यापक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करना था। सरकार ने विभिन्न देशों में सेमीकंडक्टर उद्योग के विकास का अध्ययन किया और इस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया। शुरुआत में इस कार्यक्रम को लेकर काफी संदेह भी जताया गया। सवाल उठे कि क्या भारत वास्तव में सेमीकंडक्टर उद्योग विकसित करना चाहता है और क्या देश सेमीकंडक्टर क्लीन रूम, अल्ट्राप्योर वाटर तथा अत्याधुनिक लिथोग्राफी मशीनों जैसी जटिल जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार है।
10 अरब डॉलर के कार्यक्रम से हुई शुरुआत
भारत ने शुरुआत में विकसित देशों की तरह सैकड़ों अरब डॉलर खर्च करने के बजाय 10 अरब डॉलर के कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया। इसका इस्तेमाल फैब्रिकेशन प्लांट यानी फैब और सेमीकंडक्टर पैकेजिंग यूनिट स्थापित करने में सहायता देने के लिए किया गया। अश्वनी वैष्णव के मुताबिक, पांच साल की अवधि में सरकार ने 12 सेमीकंडक्टर यूनिट को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं में कुल 20 अरब डॉलर का निवेश प्रस्तावित है।
तीन यूनिट में शुरू हुआ कमर्शियल प्रोडक्शन
मंजूर की गई 12 यूनिट में से तीन ने कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू कर दिया है।
अन्य मंजूर यूनिट में निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। वैष्णव के अनुसार, भारत की उपलब्धि को केवल मंजूर किए गए प्लांट या निवेश की राशि से नहीं मापा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि देश में सेमीकंडक्टर उद्योग की बुनियाद तैयार होना है।
चिप डिजाइन में भारत की बढ़ती क्षमता
सेमीकंडक्टर उद्योग में मैन्युफैक्चरिंग के साथ चिप डिजाइन भी बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार ने शुरुआत में 10 वर्षों में 85,000 कुशल इंजीनियरों का पूल तैयार करने का लक्ष्य रखा था। इसके लिए सेमीकंडक्टर से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू किए गए और मौजूदा पाठ्यक्रमों में बदलाव किया गया। ‘Chips to Startup’ कार्यक्रम के तहत युवा इंजीनियरों को इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन यानी ईडीए टूल उपलब्ध कराए गए हैं। अब तक 320 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्टार्टअप को ये टूल दिए जा चुके हैं। हाल के सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम में भारतीय छात्रों द्वारा इन टूल की मदद से डिजाइन की गई 40 चिप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने प्रस्तुत की गईं।
भारत बना प्रमुख चिप डिजाइन बेस
वैष्णव के मुताबिक, लगभग सभी प्रमुख सेमीकंडक्टर डिजाइन कंपनियों के भारत में बड़े डिजाइन सेंटर हैं। भारतीय इंजीनियर 2-नैनोमीटर और 3-नैनोमीटर जैसे अत्याधुनिक प्रोसेस नोड पर आधारित चिप डिजाइन पर काम कर रहे हैं। सरकार ने ‘Design Link Incentive’ योजना के जरिए स्टार्टअप को भी सहायता दी है। इसके तहत 105 स्टार्टअप को समर्थन मिला है। इनमें 24 स्टार्टअप को कुल 83 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता मिली, जबकि इनमें से 15 स्टार्टअप बाद में कुल 118.5 मिलियन डॉलर की वेंचर कैपिटल फंडिंग हासिल करने में सफल रहे।
वैश्विक कंपनियों का बढ़ रहा भरोसा
भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के विकास का असर वैश्विक कंपनियों के निवेश रुझान पर भी दिखाई देने लगा है। वैष्णव के अनुसार, सेमीकॉन कार्यक्रम के अलावा वैश्विक कंपनियां भारत में 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर रही हैं। उनके मुताबिक, कुछ साल पहले तक कॉरपोरेट बोर्डरूम और आर्थिक मंचों पर भारत की सेमीकंडक्टर क्षमता को लेकर संदेह था। अब यह चर्चा धीरे-धीरे ‘क्यूरियस ऑप्टिमिज्म’ यानी उत्सुक आशावाद में बदल रही है।
सेमीकॉन 2.0 से और गहरा होगा इकोसिस्टम
भारत ने अब सेमीकॉन 2.0 की घोषणा की है। इसका लक्ष्य मौजूदा सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को और व्यापक तथा आत्मनिर्भर बनाना है। इसके तहत सात प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा।
चिप डिजाइन का होगा विस्तार
पहला फोकस चिप डिजाइन पर होगा। इसमें छह प्रमुख बिल्डिंग ब्लॉक—कंप्यूट, मेमोरी, रेडियो फ्रीक्वेंसी (आरएफ), पावर, नेटवर्किंग और सेंसर—पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाली चिप के डिजाइन में भारत की क्षमताओं का विस्तार करना है।
सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग मशीनों पर जोर
चिप बनाने के लिए अत्याधुनिक और बेहद जटिल मशीनों की जरूरत होती है। सेमीकॉन 2.0 के तहत सरकार सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग उपकरणों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करेगी। इसका उद्देश्य चिप उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करना और सप्लाई चेन के इस महत्वपूर्ण हिस्से में भारत की क्षमता विकसित करना है।
सेमीकंडक्टर सामग्री का घरेलू उत्पादन
चिप निर्माण में बड़ी संख्या में विशेष सामग्री, गैस और केमिकल की जरूरत होती है। वैष्णव के अनुसार, सेमीकंडक्टर उत्पादन में 150 से 500 तक विशेष रसायन, गैस और सामग्री का इस्तेमाल हो सकता है। सेमीकॉन 2.0 के तहत इन सामग्रियों के घरेलू उत्पादन को भी समर्थन दिया जाएगा, ताकि भारत की सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन अधिक व्यापक और मजबूत बन सके।
अधिक फैब स्थापित करने की तैयारी
भारत में फिलहाल दो सेमीकंडक्टर फैब विकसित किए जा रहे हैं। सरकार इकोसिस्टम के विस्तार के साथ अतिरिक्त फैब स्थापित करने में भी सहायता देने की योजना बना रही है। फैब सेमीकंडक्टर उद्योग का केंद्रीय हिस्सा होता है, जहां सिलिकॉन वेफर पर अत्यंत जटिल प्रक्रियाओं के जरिए चिप तैयार की जाती है।
एडवांस्ड पैकेजिंग पर बढ़ेगा फोकस
सेमीकंडक्टर पैकेजिंग चिप सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार पैकेजिंग क्षमता को जारी रखते हुए एडवांस्ड पैकेजिंग तकनीकों पर अधिक जोर देगी। इसका लक्ष्य केवल चिप निर्माण तक सीमित न रहकर पैकेजिंग सहित व्यापक सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग चेन भारत में विकसित करना है।
रिसर्च और एडवांस्ड नोड की दिशा में कदम
भारत के घरेलू इकोसिस्टम में फिलहाल 40-नैनोमीटर तकनीक उपलब्ध है। अब सरकार इससे कहीं अधिक उन्नत प्रोसेस नोड विकसित करने की रणनीति पर काम कर रही है। लक्ष्य अगले आठ वर्षों में 7-नैनोमीटर से लेकर 3-नैनोमीटर तक की तकनीक भारत में लाना है। यह एक बड़ी तकनीकी चुनौती है, क्योंकि एडवांस्ड सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए लंबे अनुसंधान एवं विकास चक्र और अत्यधिक जटिल तकनीकी क्षमताओं की जरूरत होती है।
एक लाख चिप डिजाइन इंजीनियर तैयार करने का लक्ष्य
सेमीकॉन 2.0 के तहत टैलेंट डेवलपमेंट को भी बड़े स्तर पर बढ़ाया जाएगा। सरकार आने वाले वर्षों में एक लाख चिप डिजाइन इंजीनियरों को प्रशिक्षित करने की योजना बना रही है। व्यापक लक्ष्य भारत को आईटी सर्विसेज में मिली सफलता की तरह सेमीकंडक्टर डिजाइन के क्षेत्र में भी वैश्विक केंद्र बनाना है।
भारत ने मैच्योर टेक्नोलॉजी से शुरुआत क्यों की
भारत के सेमीकंडक्टर कार्यक्रम को लेकर अलग-अलग तरह की आलोचनाएं भी हुई हैं। कुछ लोगों ने इसे बहुत कम प्रयास बताया, जबकि कुछ ने सरकार के अधिक खर्च करने पर सवाल उठाए। एक प्रमुख सवाल यह भी रहा कि जब दुनिया के अग्रणी देश 5-नैनोमीटर, 3-नैनोमीटर और 2-नैनोमीटर तकनीक पर काम कर रहे हैं, तो भारत अपेक्षाकृत मैच्योर नोड से क्यों शुरुआत कर रहा है। वैष्णव ने इस आलोचना को समझने योग्य बताते हुए इसे बहुत सरल आकलन करार दिया। उन्होंने सेमीकंडक्टर उद्योग की तुलना आम के पेड़ से की। एक बड़ा और परिपक्व पेड़ अपने दम पर फल दे सकता है, लेकिन एक नए पौधे को शुरुआती दौर में पानी, खाद और सुरक्षा की जरूरत होती है। इसी तरह भारत का शुरुआती सेमीकंडक्टर उद्योग भी विकास के दौर में है और उसे सरकारी सहयोग की जरूरत है। जिन देशों के पास आज 2-नैनोमीटर तकनीक है, उन्होंने इस क्षेत्र में कई दशक पहले काम शुरू किया था, जबकि भारत का मौजूदा सेमीकंडक्टर कार्यक्रम अभी करीब पांच साल पुराना है।
इलेक्ट्रॉनिक्स से संपूर्ण सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन तक
भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। पहले चरण में नीतिगत सुधारों और मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव के जरिए मजबूत इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग आधार तैयार किया गया। दूसरे चरण में सेमीकॉन इंडिया के जरिए फैब और पैकेजिंग यूनिट स्थापित करने की दिशा में कदम उठाए गए। इसके समानांतर चिप डिजाइन क्षमता विकसित करने, स्टार्टअप को सहायता देने और कुशल प्रतिभाओं का पूल तैयार करने पर भी काम किया गया। अब सेमीकॉन 2.0 के जरिए इस इकोसिस्टम को और गहरा बनाने की कोशिश है। इसमें चिप डिजाइन, घरेलू उपकरण और सामग्री निर्माण, अतिरिक्त फैब, एडवांस्ड पैकेजिंग, रिसर्च और टैलेंट डेवलपमेंट पर जोर दिया जाएगा।
लक्ष्य केवल चिप बनाना नहीं, पूरी वैल्यू चेन तैयार करना
सरकार का घोषित लक्ष्य भारत में केवल सेमीकंडक्टर चिप का उत्पादन करना नहीं, बल्कि पूरी सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में क्षमता विकसित करना है। 12 मंजूर सेमीकंडक्टर यूनिट, 20 अरब डॉलर का संचयी निवेश, तीन यूनिट में कमर्शियल प्रोडक्शन, 300 से अधिक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, तेजी से बढ़ता चिप डिजाइन इकोसिस्टम और सेमीकॉन कार्यक्रम के बाहर 3 अरब डॉलर से अधिक का वैश्विक निवेश इस दिशा में आगे बढ़ते कदमों को दर्शाता है। आने वाले वर्षों में भारत का लक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेंटर से आगे बढ़कर सेमीकंडक्टर डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और इससे जुड़ी तकनीकों का एक महत्वपूर्ण वैश्विक केंद्र बनना है।