Karnataka High Court ने एक बड़े फैसले में सरकारी टेलीकॉम कंपनी को 55 लाख रुपये से ज़्यादा का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। कंपनी ने बिना सही जांच के डुप्लीकेट SIM कार्ड जारी कर दिया था, जिससे धोखेबाज़ों को एक को-ऑपरेटिव बैंक से 87.7 लाख रुपये चुराने का मौका मिल गया। कोर्ट ने कहा कि BSNL की लापरवाही ने साइबर फ्रॉड में अहम भूमिका निभाई, क्योंकि डुप्लीकेट SIM ने अपराधियों को ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांज़ैक्शन को मंज़ूरी देने के लिए ज़रूरी वन-टाइम पासवर्ड (OTP) का एक्सेस दे दिया था।
फ्रॉड कैसे हुआ यह मामला श्री बसवेश्वर पटना सहकारा बैंक नियमिथा से जुड़ा है, जिसका केनरा बैंक में करंट अकाउंट था। यह अकाउंट BSNL के एक मोबाइल नंबर से जुड़ा था, जिसका इस्तेमाल इंटरनेट बैंकिंग के लिए OTP पाने के लिए किया जाता था। 6 और 7 फरवरी, 2019 के बीच, धोखेबाज़ों ने सात बिना इजाज़त ऑनलाइन ट्रांज़ैक्शन किए और बैंक के अकाउंट से कुल 87.7 लाख रुपये ट्रांसफर कर लिए। बाद में जांच में पता चला कि किसी अनजान व्यक्ति ने बेंगलुरु में BSNL ऑफिस से बैंक के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से जुड़ा डुप्लीकेट SIM कार्ड लिया था। बैंक ने कहा कि उसने कभी रिप्लेसमेंट SIM कार्ड के लिए रिक्वेस्ट नहीं की थी और न ही किसी को इसे लेने के लिए ऑथराइज़ किया था। एक बार जब फ्रॉड करने वालों ने मोबाइल नंबर पर कंट्रोल कर लिया, तो वे OTP पा सके और ट्रांज़ैक्श
न पूरे कर सके। कोर्ट ने BSNL को ज़िम्मेदार क्यों ठहराया? हाई कोर्ट ने पाया कि डुप्लीकेट SIM कार्ड बिना सही वेरिफ़िकेशन के जारी किया गया था। कोर्ट के मुताबिक, यह कोई छोटी-मोटी गलती नहीं थी, बल्कि फ्रॉड मुमकिन होने की मुख्य वजह थी। जस्टिस सूरज गोविंदराज ने कहा कि SIM कार्ड जारी करना टेलीकॉम कंपनियों की मुख्य ज़िम्मेदारी है और उन्हें रिप्लेसमेंट SIM मांगने वाले किसी भी व्यक्ति की पहचान सावधानी से वेरिफ़ाई करनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि आज की डिजिटल दुनिया में टेलीकॉम ऑपरेटर्स की अहम जगह है क्योंकि बैंकिंग सिस्टम सिक्योरिटी के लिए मोबाइल नंबर और OTP पर बहुत ज़्यादा निर्भर करते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर डुप्लीकेट SIM गलत हाथों में पड़ जाता है, तो OTP से मिलने वाली सुरक्षा जल्दी खत्म हो सकती है। BSNL इल्ज़ाम नहीं हटा सकता BSNL ने दलील दी कि अगर कोई गलत काम हुआ है, तो वह कंपनी का नहीं, बल्कि किसी एक कर्मचारी का काम था। कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी ऑफिशियल ड्यूटी कर रहे होते हैं, तो उनके कामों के लिए कंपनियां जिम्मेदार होती हैं।
चूंकि SIM कार्ड जारी करना BSNL के रेगुलर काम का हिस्सा है, इसलिए उस प्रोसेस में किसी भी लापरवाही के लिए कंपनी को जिम्मेदार होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी बताया कि BSNL ने पहले ही शामिल कर्मचारी के खिलाफ डिसिप्लिनरी एक्शन शुरू कर दिया था। केनरा बैंक को बरी किया गया को-ऑपरेटिव बैंक ने केनरा बैंक के खिलाफ भी एक्शन लेने की मांग की थी। हालांकि, हाई कोर्ट पहले के इस फैसले से सहमत था कि केनरा बैंक नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं था। बैंक के खिलाफ कोई राहत नहीं दी गई। टेलीकॉम कंपनियों के लिए जरूरी मैसेज यह फैसला देश भर के टेलीकॉम ऑपरेटरों को एक कड़ा मैसेज देता है।
चूंकि ज्यादा बैंकिंग सर्विसेज़ मोबाइल फोन और OTP पर निर्भर करती हैं, इसलिए कंपनियों को डुप्लीकेट SIM कार्ड जारी करने से पहले सख्त जांच करनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि टेलीकॉम प्रोवाइडर डिजिटल सिक्योरिटी के गेटकीपर के तौर पर काम करते हैं, और वेरिफिकेशन में कोई भी चूक कस्टमर्स को भारी फाइनेंशियल नुकसान पहुंचा सकती है। BSNL को जिम्मेदार ठहराकर, हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि टेलीकॉम कंपनियां डिजिटल बैंकिंग सिस्टम की सुरक्षा में अपनी जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं कर सकती हैं।